अध्याय13 श्लोक16 - श्रीमद भगवद गीता

श्रीमद भगवद गीता

अध्याय 13 : पुरुष और प्रकृति

अ 13 : श 16

बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च ।
सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञयं दूरस्थं चान्तिके च तत् ॥

संधि विच्छेद

बहिः अन्तः भुतानाम् अचरं चरं एव च ।
सुक्ष्मत्वत् तत् अविज्ञयं दूरस्थं च अन्तिके च तत् ॥

अनुवाद

It is inside as well as outside, in the moveable and the immoveable creatures. Being subtle,It is not knowable. It is far away, and yet so very near.

व्याख्या

पिछले श्लोक में ब्रम्ह ने निम्न गुणों का वर्णन किया गया
१. ब्रह्म जीवों के अंगो के सभी कार्यों को प्रकाशित करता है
२. जीवों के अंगो के द्वारा किये गए अनुभवों को ग्रहण करता है

इस श्लोक में भगवान श्री कृष्ण ब्रह्म ब्रम्ह के तीन अन्य गुणों का वर्णन किया गया है, वे तीन गुण इस प्रकार हैं
१. सर्वव्यापी
२. ब्रह्म अत्यंत सूक्ष्म है
३. सबसे दूर है फिर भी समीप है

इन तीन गुणों की विस्तार से चर्चा इस प्रकार है

१. सर्वव्यापी ब्रह्म
ब्रह्म सभी चर और अचर जीवों और पदार्थों के अंदर और बाहर स्थित है। ब्रह्म के इस गुण से ब्रह्म के सर्वव्यापी होना सिद्ध होता है। इस गुण से यह भी सिद्ध होता है कि ब्रह्म ऊर्जा या बिद्युत क्षेत्र या आकाश की तरह की कोई इकाई है कोई ठोस वस्तु नहीं ।

२. ब्रह्म अत्यंत सूक्ष्म है

ब्रह्म अत्यंत सूक्ष्म है, इतना सूक्ष्म है कि अंगों से इसको अनुभव नहीं किया जा सकता और न ही किसी भौतिक विधि से इसको मापा नहीं जा सकता है।

३. सबसे दूर है फिर भी समीप है

इसके दो शब्द प्रथम दृष्टि में एक दूसरे के विपरीत अर्थ देते हुए प्रतीत होते हैं, लेकिन अगर हम ध्यान से देखें तो इनके अर्थ स्पस्ट होते हैं। ब्रह्म का एक गुण है कि यह सर्वव्यापी है इससे यह स्वतः ही सिद्ध होता है की ब्रह्म सब जगह व्याप्त है, अर्थात हम कहीं भी रहें ब्रह्म हर स्थान पर स्थित है। तात्पर्य की ब्रह्म हमेशा हमारे समीप है। लेकिन ब्रह्म इतना सूक्ष्म है कि अंगो से इसको अनुभव नहीं किया जा सकता और न ही किसी भी भौतिक विधि से इसे मापा जा सकता है, अर्थात समीप होते हुए भी ब्रह्म हमसे अवज्ञ रहता है। हम इसको जान नहीं सकते अर्थात यह हमारी समझ से परे है। दूर होने का यही अर्थ है।

इस श्लोक और इसके पहले से यह सिद्ध होता है की ब्रह्म आकाश या गुरुत्वाकर्षण या विद्युत् क्षेत्र की तरह की कोई इकाई है, जैसे गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र प्रत्येक वस्तु के अंदर होता है और बाहर भी। जैसे आकाश प्रत्येक वस्तु के अंदर है और बाहर भी उसी प्रकार ब्रह्म भी प्रत्येक भी चूँकि सब जगह व्याप्त और और सभी वस्तुओं के अंदर और बाहर स्थित है। इस तरह के गुण आकाश या गुरुत्वाकर्षण या विद्युत् क्षेत्र की तरह की इकाईओं के होते हैं।

ब्रह्म के इन गुणों में अध्याय १४ के श्लोक ३ में वर्णित ब्रह्म के गुण को जिसमे यह कहा गया है की ब्रह्म गर्भ के समान है जिससे जीवन की उत्पति होती है। अगर इससे दूसरा सिद्धांत उभरकर आता है और वह कि जीवन शक्ति आकाश या गुरुत्वाकर्षण की तरह की कोई इकाई है। इस सिद्धांत से आत्मा के गुण अपने आप सिद्ध हो जाते हैं। आत्मा के मुख्य गुणो में से है की आत्मा अनंत है, यह न जन्म लेता है न मरता है, यह सर्वगामी है , इसका नाश नहीं हो सकता आदि। आत्मा से सारे गुण लगभग वही हैं जो ब्रह्म के सिवाय कुछ गुण जिसमे यह कि ब्रह्म सर्वव्यापी है, यह सभी वस्तुओं के अंदर और बाहर है। आत्मा अनंत तो है लेकिन यह ब्रह्म के समान सर्वव्यापी नहीं बल्कि एक समय में एक ही शरीर को धारण करता है।

इन श्लोकों में वर्णित ब्रह्म के गुणों को समझ लेने से सनातन धर्म के कई गूढ़ सिद्धांतों के प्रश्नो के उत्तर मिल जाते हैं।


श्री हरि ॐ तत्