इस श्लोक में ब्रह्म के तीन अन्य अत्यंत ही गूढ़ और महत्वपूर्ण गुणों का वर्णन है, यह गन हैं
१. यह अविभाज्य है फिर भी विभक्त रूप में जीवों में व्याप्त है
२. यह सभी जीवों का भरण करने वाला है
३. यह ग्रास और सृजन करने वाला है
यह तीनो ही गुण समझने में अत्यंत कठिन और गूढ़ हैं लेकिन ब्रह्म के इन गुणों के समझ लेने से सनातन धर्म के कई कठिन सिधान्तो की व्याख्या हो जाती है और कई कठिन प्रश्नो के उत्तर मिल जाते हैं, एक एक गुण का विस्तार से वर्णन करते हैं
१. यह अविभाज्य है फिर भी विभक्त रूप में जीवों में व्याप्त है इस वाक्यांश पढ़ने से एक पल के लिए शब्दों की बीच विरोधभास सा प्रतीत होता है। अविभाज्य का अर्थ होता है वह जो विभाजित न हो या जिसे विभाजित नहीं किया जा सके। विभक्त का अर्थ इसके ठीक विपरीत होता है, अर्थात वह जो विभाजित हो। इस श्लोक में यह कहना की ब्रह्म अविभाज्य है लेकिन फिर भी यह सभी जीवों के अलग अलग रूप से व्याप्त है, स्थित है जैसे विभक्त हो। ऐसा कैसे संभव है। गूढ़ता यहीं पर है। यह सही है की कोई भौतिक वस्तु एक ही समय में अविभाज्य या विभक्त नहीं हो सकती लेकिन फिर अभौतिक चीज़ों पर यह बंधन लागु नहीं होता। इस श्लोक से पहले ब्रह्म के गुणों से यह स्पस्ट है की ब्रह्म एक अव्यक्त अभौतिक इकाई ही है। उदहारण के लिए आकाश। आकाश एक ऐसी चीज़ है जो अविभाज्य है, सब जगह एक सामान है। लेकिन यह आकाश सभी परमाणु में व्याप्त है। किसी भी भौतिक पदार्थ का एक बड़ा हिस्सा आकाश ही होता है। ब्रह्म भी कुछ इसी प्रकार का है। यह अविभाज्य है, ब्रम्हांड में सब जगह स्थित है लेकिन यह जीव के अंदर भी ऐसे स्थित है जैसे ऐसा प्रतीत होता है की यह जीव के शरीर से बंधी कोई इकाई है और शरीर के बाहर नहीं।
आखिर इसका मतलब क्या है?
इसका उत्तर जानने के लिए हमे आत्मा के गुणों को जानना चाहिए। अध्याय २ में वर्णित आत्मा के गुणों को अगर हम ध्यान से देखें तो पाएंगे की आत्मा के कुछ गुण हूबहू ब्रह्म के गुणों से मिलते हैं जैसे
१. आत्मा अनंत है
२. आत्मा न जन्म लेता है न मरता है
३. आत्मा अविनाशी है
४. आत्मा अव्यय है (जो परिवर्तित न हो )
५. यह पुरातन है
६. आत्मा पवित्र है
७ आत्मा अव्यक्त है
यह सारे के सरे गुण ब्रह्म के भी गुण है
लेकिन हाँ ब्रह्म और आत्मा में मूलभूत अंतर हैं
१. ब्रह्म सर्व व्याप्त है लेकिन आत्मा स्थानीय है (अर्थात एक ही शरीर में स्थित है )
२. ब्रह्म भर्ता, पोषण करने वाला है लेकिन आत्मा पोषित है अर्थात यह किसी और का पोषण नहीं कर सकता बल्कि निर्भर है ब्रह्म पर
३. ब्रम्ह ग्रास या सृजन कर सकता है आत्मा नहीं, आत्मा सिर्फ और सिर्फ एक शरीर का त्याग कर दूसरे शरीर में जा सकता है
कुछ और भी मूलभूत अन्तर हैं
ब्रह्म और आत्मा में मूल रूप से अन्तर वैसा ही है जैसा समुद्र और जल की एक बून्द का। ब्रह्म समुद्र है और आत्मा उस समुद्र स्थित एक बुलबुला । कहने का अर्थ यह की आत्मा ब्रह्म की एक स्थानीय इकाई है। अतः ब्रह्म तो अविभाज्य है लेकिन आत्मा के रूप में एक हर जीवित शरीर में स्थित है। हालांकि आत्मा ब्रह्म ही है लेकिन शरीर में स्थित होकर स्थानीय है।
इस वाक्यांश
"यह अविभाज्य है फिर भी विभक्त रूप में जीवों में व्याप्त है"
अर्थ यह निकालता है कि ब्रह्म हालांकि अविभाज्य है लेकिन आत्मा के रूप में शरीर में स्थानीय रूप से स्थित है अतः विभक्त प्रतीत होता है। जैसे समुद्र की एक बून्द बायु की परतों से घिरकर एक बुलबुला बन जाता है और एक अलग इकाई प्रतीत होता है। ब्रह्म और आत्मा के इस सम्बन्ध को जानने से हम आत्मा के विलक्षण गुणों को जान सकते हैं। यही नहीं इस सम्बन्ध को जानने के बाद हम मोक्ष की परिभाषा को भी भली भांति समझ सकते हैं। जिस दिन आत्मा शरीर के बंधन से मुक्त हो जाती है उसी समय वह ब्रह्म में मिल जाती है. जैसे बुलबुला फूटने के बाद पुनः समुंद्र में समा जाता है।
२. यह सभी जीवों का भरण करने वाला है इस वाख्यांश का अर्थ यह है की ब्रह्म ही वह इकाई है जिससे पुरे ब्रम्हांड में जीवन स्थित है। जीवन एक अनंत गुण है क्योंकि आत्मा अनंत है और आत्मा अनंत ही इसलिए है क्योंकि यह ब्रह्म से ही उत्त्पन्न हुआ है। सभी जीवों में जीवन का मुख्य कारण और श्रोत ही ब्रह्म है।
३. यह ग्रास और सृजन करने वाला है दूसरे गुणों के साथ ब्रह्म के इस गुण की सहायता सी ही प्रारब्ध और पुनर्जन्म की व्याख्या संभव है। इसके साथ ही ब्रह्म के इस गुण से ब्रम्हांड में जीवन की उत्त्पत्ति कैसे हुई और कैसे जीवात्मा के शरीर से दूसरे शरीर में स्थित होते हुए जीवन की यात्रा अक्षुण रखती है।
जब आत्मा एक शरीर को छोड़कर दूसरे शरीर में प्रवेश करता है तो उसमे एक जीव का ग्रास होता है और दूसरे जीव का सृजन। एक जीव का ग्रास और दूसरे जीव के रूप में प्रकट होना का श्रोत ब्रह्म ही है। यही इस वाक्यांश का अर्थ है।
श्री हरि ॐ तत्